बबुरी स्थित मां बागेश्वरी धाम के पावन प्रांगण में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा

ज्ञान यज्ञ के षष्ठम दिवस पर व्यास पीठ से पंडित कमोद मिश्र शास्त्री जी ने भक्तिरस की गंगा बहा दी। कथा में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में गुरु-शिष्य संबंध, भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और भक्तों के उद्धार की कथाएं सुनकर पूरा पंडाल भाव-विभोर हो गया। कथा का शुभारंभ गुरु महिमा से हुआ। पंडित शास्त्री जी ने कहा कि *गुरु कभी छोटा-बड़ा नहीं होता*, गुरु तो साक्षात ब्रह्मस्वरूप होते हैं। हमारी भक्ति छोटी-बड़ी हो सकती है, लेकिन गुरु की कृपा सदा असीम रहती है। उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति से ही जीव का उद्धार संभव है। शरद पूर्णिमा की रात्रि का वर्णन करते हुए व्यास जी ने कहा कि वृंदावन में उस रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया। महामाया ने उस एक रात्रि को छह महीने के समान विस्तारित कर दिया, ताकि गोपियों की भक्ति पूर्ण हो सके। इसी प्रसंग में गोपियों का भावपूर्ण गीत *”मैं दासी बन जाऊं श्याम मुरलिया वाले की”* गूंजा, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर होकर नाचने लगे।
महारास की प्रस्तुति में व्यास जी ने”राधा नाचे कृष्ण नाचे नाचे गोपी गन, मन मेरो बन गयो सखी रे पावन वृंदावन।”इस भजन ने पूरे वातावरण को वृंदावनमय कर दिया। अक्रूर जी को जब भगवान ने विराट रूप दिखाया तो उनका अज्ञान दूर हो गया। वहीं कुब्जा की टेढ़ी काया को श्रीकृष्ण ने स्पर्श मात्र से सीधा कर दिया, जो यह दर्शाता है कि प्रभु भक्त के भाव देखते हैं, रूप नहीं। मथुरा प्रसंग में *धनुषभंग*, *कंस वध* और *गुरु संदीपनि के आश्रम में विद्या प्राप्ति* की लीलाओं का वर्णन हुआ। इसके बाद *जरासंध से युद्ध*, *द्वारिका पुरी की स्थापना* और अंत में *रुक्मिणी विवाह* की कथा सुनाकर व्यास जी ने कथा को विश्राम दिया। कथा के दौरान पूरे समय श्रद्धालु जय श्रीकृष्ण, राधे-राधे के जयकारे लगाते रहे। मां बागेश्वरी के आंगन में हो रही यह कथा क्षेत्रीय लोगों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन गई है, जहां हर कोई कृष्णभक्ति में डूबकर तन-मन से पवित्र हो रहा है। मंच संचालन कृष्ण कुमार पांडे ने किया।
रिपोर्ट -: वैभव त्रिपाठी






